## कपड़ों की भाषा #Poetry ![[Pub-Language-of-Clothes.webp]] कपड़ों की भी भाषा होती है वो देखने वालों से बात करते हैं हर नज़र को नज़ाकत से लौटाते हैं लगातार बिलकुल आईने की तरह... कपड़े थकते भी हैं जब ज़्यादा देख लिए जाते हैं उनकी चमक के छिलके से उतरते जाते हैं शायद नज़र उन्हें खर्च कर देती है वैसे क्या दिखना.. खर्च होना है? थकान से गिरते शरीर को टांगकर घर लाते हुए कपड़े मैंने अक्सर देखे हैं.... जो मनुष्य के हर वेग को, आवेग को थकान और चोट को.. तरह तरह के खोट को संभाल कर रखते हैं और बेडरूम तक पहुंचकर देह छोड़ देते हैं फिर पता नहीं कैसे... हल्का हो जाता है शरीर सचमुच कपड़े उतारे बगैर.. थकान नहीं जाती   ##### Context Note Clothes as witnesses. The poem watches what garments absorb through the day - gazes, exhaustion, the full weight of a body in motion - and how shedding them at night is its own quiet unburdening. 2026-01-28