## जिसका घर जला, उसने भाषा में घर बना लिया #Faces ![[Pub-Bashir-Badr.webp]] कभी-कभी कोई शायर जाता नहीं... वो बस महफ़िल से उठकर भाषा के भीतर बैठ जाता है बशीर बद्र अब व्यक्ति नहीं रहे... अब वो एक आवाज़ हैं आज लगता है जैसे यह शेर इसी दिन के लिए लिखा गया था। >उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए 91 वर्ष के बाद शाम हो चुकी है.. लेकिन यादों का उजाला फैला हुआ है... बशीर बद्र हमें रह रहकर अपनी रचनाओं के ज़रिए क्यों याद आते रहेंगे? क्योंकि आज भाषा बहुत तेज़ है, लेकिन कम नर्म है। बहुत loud है, लेकिन कम तहज़ीबदार है। बहुत viral है, लेकिन कम याद रहने वाली है। उनकी आवाज़ में मिठास थी, लेकिन वो मिठास चीनी जैसी नहीं, पुराने घाव पर रखे शहद जैसी थी। उसमें इंतज़ार था, तन्हाई थी, अपना घर जल जाने के बाद बची हुई राख थी, और उस राख में दमकती हुई गज़ल थी... इसलिए बशीर बद्र लोगों की ज़ुबान पर.. किरायेदार की तरह नहीं, पूरे अधिकार से रहते हैं.. और रहते रहेंगे। ये मकान कोई जला नहीं पाएगा.. उनसे छीन नहीं पाएगा।     1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जल गया था.. और उनकी बहुत सी अप्रकाशित रचनाएँ भी राख हो गई थीं। ये सिर्फ़ एक शायर का निजी नुकसान नहीं था। यह भाषा की लाइब्रेरी में लगी आग थी। लेकिन बशीर बद्र की विशेषता यही थी, कि वे नफ़रत के धुएँ से भी मोहब्बत की पंक्तियों को बचा लेते थे... और एक सूत्र की तरह अपनी बात भी कह देते थे... >लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में आजकल घर ही नहीं जलते.. भाषा भी बहस में तुरंत ही जल जाती है, बशीर बद्र याद दिलाते हैं कि शब्दों में नमी भी रखी जा सकती है बड़ी और गहरी बात हौले से भी सुनी और समझी जा सकती है     बहुत से शायर.. शेर को चौंकाने के लिए लिखते हैं। बशीर बद्र शेर को धीरे-धीरे खुलने के लिए लिखते थे। उनकी रचनाओं में दुख निजी रहता है, लेकिन उसकी भाषा सामूहिक हो जाती है। यही वजह है कि लोग उनके शेरों में अपनी कहानी पढ़ते रहे। अपने एक एक शेर से उनकी ये चाहत जुड़ी हुई है कि भाषा बोलचाल वाली हो और उसे दुनिया के किसी भी हिस्से में पढ़ा जाए.. तो पढ़ने वाले को आपबीती महसूस हो। शहरों की बदहवासी, हर पल उलझकर रहना... अपनी धार से लोगों को छीलते-काटते चलना.. लोगों की मजबूरियां, दुश्वारियां.. वो खूब समझते थे... इसलिए दूरी-नज़दीकी, दोस्ती-दुश्मनी का संतुलन कैसे रखा जाए ये उन्होंने बहुत आसानी से दो शेरों में कह दिया.. >दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों >कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो हालांकि शर्म और लिहाज़ की मात्रा बहुत कम है इस दौर में फिर भी ये शेर कहावतों की तरह दोहराए जाते हैं। इनमें से दुश्मनी वाला शेर तो शिमला समझौते के समय इंदिरा गांधी ने भी ज़ुलफिकार अली भुट्टो को सुनाया था   इंसान को कठोर फ़ैसलों में बाँट देने वाले समय में वो मजबूरियों की गुंजाइश भी छोड़ते थे। >कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता बशीर बद्र के पहले संकलन का नाम था ईकाई, जिसमें कठिन शब्दों वाली गज़लों की संख्या अच्छी खासी थी। लेकिन इसके बाद उन्होंने गज़ल को डिक्शनरी से निकालकर, ड्रॉइंग रूम, मोहल्ले, ट्रेन कंपार्टमेंट, होस्टल... और टूटे हुए दिलों की जेब में रख दिया।     आख़िरी दिनों की सबसे मार्मिक बात यह रही कि जिन शब्दों ने लाखों लोगों की स्मृति में घर बना लिया, वही शब्द धीरे-धीरे बशीर बद्र की अपनी स्मृति से छूटने लगे। डिमेंशिया जैसी बीमारी एक शायर के लिए सिर्फ़ बीमारी नहीं होती... ये अपने ही भीतर बनी लाइब्रेरी में अंधेरा भर जाने जैसा दुख है। लेकिन उस अंधेरे में भी.. उनके शेर गूंजते रहे।     उनके शेर नेताओं ने quote किए, मुशायरों ने जिये, प्रेमियों ने याद किए, तन्हा लोगों ने तकिए के नीचे रखे, अपनी डायरियों में दर्ज किए... और अब वो शेर ज़िंदगी में इतने घुल मिल गए हैं.. कि हर दूसरे मौके पर सुनाई दे जाते हैं।     तो फलसफ़ा ये है कि जिस आदमी का घर जला, उसने भाषा में अपना स्थायी घर बना लिया। यही शायर की असली उम्र है... जन्म और मृत्यु के बीच नहीं, क़िताब और स्मृति के बीच। 2026-05-28