## Bedside
### आपके सिरहाने किताबें हैं या मोबाइल फ़ोन?
#CCTV
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पहले सिरहाने किताबें रखकर सोते थे, अब मोबाइल फ़ोन चार्जिंग पर लगाकर सोते हैं।
WhatsApp, Facebook, Twitter और Instagram के दौर में किताबों के साथ समय कम बीतता है। किताबें पुराने दोस्तों की तरह हो गई हैं। कभी कभी बात होती है.. और मुलाक़ात तो लगभग ना के बराबर होती है। शहरों में पुस्तक मेले लगते हैं, तो लोगों को याद आता है कि उन्हें किताबों के क़रीब जाना है। लोग ख़ूब ख़रीद रहे हैं किताबें.. उन्हें घर में इकठ्ठा कर रहे हैं। लेकिन पढ़ने का समय किसी के पास नहीं है। जो कर्मक्षेत्र पढ़ने के प्रीमियम पर ही चलने थे... उनमें काम करने वाले बड़े बड़े लोग भी किताबों से दूर ही रहते हैं.. [[Theatrics of Knowledge| ज्ञान का अभिनय]] उनकी बातों में रिसता है।
किताबें अब ड्राइंग रूम की सज्जा के काम आने लगी हैं, कैमरे का फ्रेम बनाने लगी हैं और घर आने वाले को ये बताने लगी हैं कि 'किताब मालिक' पढ़ा लिखा है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर अपनी छवि चमकाने के काम आती हैं। किसी से बातचीत करते हुए, सामने वाले के दिमाग़ पर अपने बौद्धिक वज़न के बट्टे रखने के काम आती हैं।
उम्बर्टो इको (Umberto Eco) एक प्रसिद्ध इतालवी लेखक, दार्शनिक और विद्वान थे। जिनकी 30000 किताबों वाली पर्सनल लाइब्रेरी थी। लोग उनसे पूछते थे कि "आपने इनमें से कितनी किताबें पढ़ी हैं?” और वो मुस्कुराकर कह देते थे कि ये [[Anti-Library]] (एंटी-लाइब्रेरी) है...
वो मानते थे कि निजी लाइब्रेरी दिखावे की चीज़ नहीं, बल्कि शोध का औज़ार है। असल में, पढ़ी हुई किताबों से ज़्यादा अहमियत उन किताबों की है जो अभी नहीं पढ़ी गईं। सच तो यह है कि जितना ज़्यादा आप जानते हैं, उतनी ही लंबी पंक्ति उन किताबों की हो जाती है जो आपने नहीं पढ़ी हैं। इस तरह एक एंटी-लाइब्रेरी बन जाती है जो आपकी जिज्ञासा और सीखने की भूख को ज़िंदा रखती हैं।
मुझे लगता है कि बार बार नया होना ही बड़ा होना है.. इस लिहाज़ से एंटी-लाइब्रेरी वाली सोच में अपनापन है।
आप अपनी लाइब्रेरी से कोई भी किताब उठाकर चलते फिरते एक-आधा पन्ना भी पढ़ लेते हैं, तो कोई न कोई बात अच्छी लग जाती है, याद रह जाती है.. और व्यक्तित्व में आधी चुटकी नमक की तरह घुल जाती है।
जब कोई नहीं होता.. और किसी के कंधे पर सिर रखकर, दिल की बात कहने का मन होता है.. तो कुछ किताबें अपने आप हाथ में आ जाती हैं.. और लोग कुछ कहने के बजाए.. किताबों को पढ़ने लगते हैं.. अपने दिल की बात में थोड़ा सा नमक मिला देते हैं.. किताबों की थोड़ी सी ख़ुशबू मिला देते हैं।
परंतु अभिनेताओं को ये खुशबू नहीं... किताबों से भरा फ्रेम मिलता है... स्वादहीन.. गंधहीन.. भावहीन
##### Context Note
Books used to sleep where phones now charge. They have moved from companion to ornament without anyone formally announcing the change.
2018-01-12