## है ख़बर गर्म - Break-ing News
#Poetry
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झुकी-बुझी
भीगी-थकी
नज़रें हैं और हैं
अंगारों से सवाल
जवाब नहीं मिलता
तो क्या है
वो भूख से
बिलखता है
कॉपी पर चलाता नहीं
फैलाता है हाथ
तो क्या है
गिरे हुए को
उठाने की
भटके को
आईना दिखाने की
रास्ता बताने की
फुरसत कहां है
‘बिक’नी हसीना की
एक्सक्लूसिव छींकें
चौके छक्के
चुटकुले
सपने-झूठ
जो बिकता है
वो दिखाते हैं
हमें मत सिखाओ
हम जानते हैं
कौन सी ख़बर है गर्म
##### Context Note
The poem measures news by temperature.
Questions burn,
hunger waits,
yet urgency is reassigned.
What sells rises.
What aches recedes.
“Hot” becomes a market condition,
not a moral one.
2011