## Equator
### रंगभेद वाली भूमध्य रेखा
#Poetry
![[Pub-Equator.webp]]
जब जातियां नहीं थीं, धर्म नहीं थे, तब भी रंगभेद था। रंग स्याह होते ही आदमी गुलाम हो जाता था। गुलामों की उधड़ी हुई पीठ आज भी कई तस्वीरों में दिखाई देती है। ज़ुल्म के ये प्रशस्ति पत्र पहले भी थे, आज भी हैं। त्वचा का रंग आज भी सपनों की कई नदियों को किसी बांध की तरह रोक लेता है। शायद काला रंग देखकर हंसने वाले, अंधेरे से डरते हैं। रंगभेद की भू-मध्य रेखा इस कविता से होकर गुज़र रही है। इसे पढ़िए-समझिए और सारे रंगों को आपस में मिला दीजिए।
सूरज की लकीर हमसे होकर गुज़रती है
हमारा रंग स्याह है
हाँ, हम काले हैं
हमारी आत्मा पर छाले हैं
मैदान से बाहर ही रोक दिया हमें
क्यों ?
कहा - ये साले काले हैं
दफ़ा करो इन्हें, हर गेट पर ताले हैं
हम पर हँसने वाले अंधेरे से डर गए
देखो इन्हें तो हिम्मत के भी लाले है
हमारा पसीना भी बहा... तो वो सोना था...
और वो, सब बेचकर ज़ेवर पहनने वाले है
##### Context Note
Before caste drew its circles and religion built its walls, colour was already a border. This poem follows that old, brutal equator of racism, where dark skin was turned into a reason for slavery, exclusion, ridicule, and locked gates. It reminds that the sweat of the oppressed has often become gold for those who wear the jewellery.
2018-10-07