## Interspace : दूरी #Poetry ![[Pub-Interspace-Poem.webp]] >इस कविता का जो केंद्रीय पात्र है.. वो आपकी ही तरह तैरता है हर रोज़, समय के सागर में… जहां ऊँची, तूफ़ानी लहरें आती हैं.. वहां घड़ी की सुइयों के सहारे हो जाता है.. और लहर के ढहते ही.. फिर तैरता है दम लगाकर… चीरता चला जाता है पानी को.. जीवित दिखने वाली निर्जीव वस्तुओं के बीच रास्ता बनाते हुए… लेकिन मंज़िल नहीं आती… और फिर एक बिंदु पर निराश होने के बजाए.. वो मंज़िल की तरफ बढ़ने के साथ साथ.. तैरने में आनंद लेने लगता है.. मंज़िल की रोशनी उसे हौसला देती है। इस अपूर्णता को नायक और नायिका के बीच एक डोर की तरह बांधा है मैंने… पढ़िए और बताइये कैसी लगी ? iPad पर बनाया ये रेखाचित्र अर्थ को प्रोजेक्शन देता है   समय के सागर में दूर एक टापू दिखता है उस पर एक लाइट हाउस जिसकी रोशनी बिलकुल उसी तरह घूमती है जैसे घड़ी की सुइयाँ घूमती हैं हर रोज़ रास्ते में पॉलीथिन के कई टुकड़े तैरती हुई कांच की बोतलें रंग बिरंगी मछलियाँ कई डूबे हुए पत्थर और कुछ मगरमच्छ भी इतना सब कुछ होता है हमारे बीच में कि दिन भर तैरकर भी तुम तक नहीं पहुंच पाता मैं लेकिन डूबता भी नहीं हूँ तुम्हारी रोशनी की डोर थामे.. तैरता रहता हूँ   ##### Context Note A lone figure swims through an ocean cluttered with floating debris and sunken stones, pulled forward by a revolving beam from a distant island. The poem lives in that interspace - where the distance never fully closes but the act of swimming becomes its own arrival. 2020-10-11 %% Tweet अधिकतर लोगों को यही मलाल है कि वो मंज़िल तक पहुंच नहीं पा रहे.. रास्ते में डूब जा रहे हैं ..इस बार का \#kavivaar आपको डूबने नहीं देगा… आपकी साँस फूलने नहीं देगा.. बल्कि तैरने में मदद करेगा… %%