## पुस्तक मेलों का जंतर मंतर युग
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किसी भी पुस्तक मेले में चले जाइए। पहले कुछ देर लगेगा कि आप किताबों की दुनिया में आए हैं। फिर धीरे-धीरे समझ में आता है कि आप एक वैचारिक मंडी में खड़े हैं। हर तरफ़ चिकने-चुपड़े चेहरों के साथ - कई महान लोग, कई Ex-महान, और कई ऐसे लोग भी दिखेंगे जो महान होने की waiting list में हैं.. और जल्द ही महान होने वाले हैं। साहित्य से संबंधित मेले में या फेस्ट में अक्सर सेलिब्रिटी या मुख्य अतिथि वो है, जिसका साहित्य से कोई लेना देना नहीं है।
किताबों के मेले में किताबें कई बार मुख्य पात्र नहीं लगतीं, वे background में चली जाती हैं। मुख्य पात्र हैं चेहरे, परिचय, कैमरे, नेटवर्क, नेट-वर्थ, साहित्यिक गुट। कुछ लेखक और सेलिब्रिटी अपने ही आप को इंटरव्यू दे रहे होते हैं - क्योंकि सवाल कोई कुपढ़ या चरण चुंबक पूछ रहा होता है
कई स्टॉल्स पर पूरी रणनीति किसी सेलिब्रिटी की उपस्थिति पर टिकी होती है। कोई बड़ा चेहरा किताब पकड़ ले, तो फिर कुछ देर के लिए साहित्य का भविष्य सुरक्षित लगने लगता है। बाहर धक्का-मुक्की इतनी कि बांके बिहारी मंदिर की लाइन याद आ जाए। फ़र्क़ बस इतना है कि वहाँ दर्शन के लिए भीड़ है, जबकि यहाँ भीड़ लगी है discount के लिए.. cool दिखने के लिए.. celebrity और signed copy के लिए।
इस दृश्य को देखकर लेखक को ही खलनायक मानना आसान तो है.. पर सही नहीं है। हिंदी की दुनिया में बहुत से लेखक आज भी ईमानदारी से लिख रहे हैं.... धीरे, गहरे उतरकर, बिना शोर मचाए। वे मंच लूटने नहीं आए, सचमुच लिखने आए हैं।
समस्या लेखक नहीं है। असल में दैनिक हाई-स्पीड जीवन में हमसे धैर्य खो गया है, और ऐसे में किसी को पढ़ने-सुनने की वो पुरानी गुंजाइश नहीं रही। 30 सेकेंड वाले reel युग में लंबा वाक्य पुराना मालूम पड़ता है, धीरे खुलने वाली किताब algorithm की नज़र में कमज़ोर content है। जो लेखक चिल्ला नहीं सकता, विवाद नहीं खड़ा कर सकता, viral line नहीं फेंक सकता - वह भीड़ में धुँधला पड़ने लगता है।
उधर celebrity रीलबाज़ और algorithm के प्रिय लेखक पूरी जगह को, विमर्श को घेर लेते हैं। किताब से ज़्यादा लेखक की packaging बिकने लगती है। इस सब में दुखद यह है कि जिनके पास सचमुच कुछ कहने को है, उन्हें सुनने की सामूहिक आदत कम होती जा रही है।
और फिर वही पुराना सवाल। ये किताबें जाती कहाँ हैं? कौन पढ़ता है इन्हें? किस घर की मेज़ पर खुलती हैं? किस बातचीत को बदलती हैं? या फिर ये भी सिर्फ़ सांस्कृतिक प्रमाणपत्र हैं... खरीद लीं, फोटो पोस्ट कर दी, बैग भारी हो गया, आत्मा हल्की हो गई।
ऊपरी परत पर यह संस्कृति का उत्सव है। अंदर से कई बार जंतर मंतर का साहित्यिक संस्करण मालूम पड़ता है। और दोनों जगह 99% बार सिर्फ़ वैचारिक चूड़ियाँ ही तोड़ी जा रही होती हैं।
लेखन की दुनिया में शायद यह दौर जंतर मंतर युग कहा जाएगा... जहाँ हर कोई अपने छोटे-छोटे घेरे में क्रांति कर रहा है। किसी की क्रांति माइक पर है, किसी की स्टॉल पर, किसी की reel में, किसी की पॉडकास्ट में और किसी की क्रांति है उस किताब में... जिसे खरीदा तो है, पढ़ा नहीं.. कोई नेटवर्किंग से ही लेखक बना जा रहा है.. तो कोई अपनी Reach को मेले में कैश कर रहा है।
इस माध्यम को या कहूँ कि तौर तरीक़े को भी... एक क्रांतिकारी छलाँग की ज़रूरत है - जैसी technology ने लगाई, जहाँ चीज़ें सिर्फ़ मौजूद नहीं रहीं, लोगों की आदतों में शामिल हो गईं। वरना हर साल भीड़ लौटेगी, स्टॉल फिर सजेंगे, महान और Ex-महान सेलिब्रिटी लेखक फिर मिलेंगे, सोशलाइट और रीलबाज़ लेखक फिर मंच लूटेंगे। और कुछ ईमानदार लेखक धीरे-धीरे किनारे लगते जाएँगे - जो शोर नहीं करते इसलिए सुनाई नहीं देते, जो गहराई में रहते और लिखते हैं, इसलिए feed में ऊपर नहीं आ पाते।
##### Context Note
Hindi book fairs increasingly resemble performance zones where books, authors, celebrity culture and algorithmic visibility collide. The piece looks at that spectacle, while also noting the quieter tragedy: sincere writers are not disappearing because they have nothing to say, but because the culture of patiently reading and listening is fading.
2015-02-21