## Moksha Pattam
### साँप-सीढ़ी... पाप-पुण्य
#Doorbeen
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ज़िंदगी साँप-सीढ़ी है। हर साँस का अपना बोर्ड, हर पीढ़ी का अपना खेल। कॉर्पोरेट में साँप हैं, राजनीति में साँप हैं, रिश्तों में साँप हैं - डसते सब हैं, बस ज़हर अलग-अलग होता है। एक-एक खाना बच-बचकर चलते हुए जब ऊपर पहुँचो, तो पता चलता है कि ये खेल सदियों पुराना है।
माना जाता है कि साँप-सीढ़ी के खेल का आविष्कार प्राचीन भारत में हुआ और बाद में इसके कई रूप विकसित होते चले गए। इनमें से 13वीं शताब्दी में विकसित हुए खेल को मोक्ष पट्टम कहा जाता है। ये एक ऐसा खेल था जिसमें कम उम्र से ही पाप-पुण्य का अंतर खेल-खेल में सिखा दिया जाता था।
आज साँप-सीढ़ी का खेल 100 खानों में बँटा होता है लेकिन मोक्ष पट्टम के मूल स्वरूप में 81 खाने थे जो बाद में बढ़कर 132 तक पहुँच गए थे। इसमें पहला खाना जन्म का होता था और आख़िरी खाना मोक्ष का।
साँप-सीढ़ी के खेल में साँप को पाप का और रस्सी या सीढ़ी को पुण्य का प्रतीक माना जाता था। अलग-अलग साँप अलग-अलग तरह के पापों के प्रतीक माने गए। और अलग-अलग सीढ़ियों को पुण्य का प्रतीक और मोक्ष की तरफ़ बढ़ने का साधन माना गया। इसकी जानकारी बाक़ायदा लिखी होती थी।
आज किसी से मोक्ष की बात करो तो उसे मृत्यु या इस संसार के पार जाने से जोड़ता है... लेकिन मोक्ष, साधन की शुद्धता के साथ किए गए कर्म से भी जुड़ा है।
अगली बार साँप-सीढ़ी खेलते हुए याद रखिएगा।
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2023-03-28