## सख़्त ताले और लिहाज़ की चाबियाँ
#Doorbeen 🔑🗝️🔐
आज समय के सागर में दूर तक माँ को देख रही है सिद्धार्थकीदूरबीन 🔭
सुबह संसार में खो जाने और रात को वापस लौट आने तक
माँ की धड़कन मेरे साथ चलती है।
वो कहती हैं… “माँ का दिल बच्चे के साथ ही रहता है”…
सच ही कहती हैं, ये साइंस से आगे बात है।
हम जिन्हें चाहते हैं उनकी धड़कनें महसूस कर लेते हैं।
ये आर्टिफिशियल नहीं.. मदर इंटेलिजेंस है।
अब लिहाज़ और सहनशीलता का दौर तो नहीं रहा,
बोल्ड होना और अपने हितों के लिए थोड़ा आक्रामक होना ही
भीड़ से भरे भारत में आगे बढ़ने की चाबी है...
पर मेरी माँ ने मुझे लिहाज़ और सहनशीलता की चाबियों का पूरा गुच्छा
बचपन में ही सौंप दिया था..
उन्हें हमेशा लगता है कि दुनिया के सारे ताले इन चाबियों से खुल सकते हैं।
उनके इस विश्वास पर नन्हे हाथ की तरह…
मैंने भी अपना विश्वास रख दिया।
कई ताले खुले, कई लटके रह गए..
अब लंबा समय बीतने के बाद… एक नये समय में हैं हम…
जहाँ… ताले मज़बूत, और मज़बूत, और कड़े होते चले गए हैं,
और पुराने ज़माने की चाबियाँ उन पर काम नहीं करतीं
इन दिनों चाबियों से खो जाते हैं, ताले जैसे लोग
और रिश्तों के दरवाज़े बंद रह जाते हैं
पर माँ की दी हुई वो लिहाज़ वाली चाबियाँ हमेशा मेरे साथ रहती हैं…
भले ही उनसे खुलने वाले ताले न मिलें…
नीचे लिखी मेरी ये कविता..
असल में चाबियों का वो गुच्छा है, जो माँ ने दिया था…
मैंने रखा है सँभालकर
> मां ने हमें सहना सिखाया,
> तंगहाली में रहना सिखाया
>
> जब ज़माने ने मारी ठोकरें
> कपड़े झाड़कर बढ़ना सिखाया
>
> ऊंचाई पर खड़े हुक्मरानों से
> कर्री बात कहना सिखाया
>
> जीतकर रोने वाली भीड़ में
> हारकर नाचना, हँसना सिखाया
### कविता पाठ और पेंटिंग
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### माँ पेंटिंग के बारे में
![[Pub-Chitra-Studio-Mother.webp|400]]
ये डिजिटल रेखा चित्र मैंने दो दशक में कई बार बनाया
इसकी एक यात्रा है, जो आप यहां देख सकते हैं : [[Mother in Pixels|Pixels में माँ]]