## Oxygen : अपनेपन की प्राणवायु #Poetry ![[Pub-Oxygen.webp]] एक एक सांस को सहेजकर... धुन में बांधकर.. तुम्हारे लिए थोड़ी सी प्राणवायु... लेकर आया हूं... ये भी ऑक्सीजन है... इसका सिलेंडर मुफ्त है... सबके लिए उपलब्ध है... &nbsp; तुम्हारी साँस से मेरी साँस का रिश्ता है हमारे दर्द मिलते हैं.. तो फ़ासला मिटता है हर साँस में छोटी सी मौत का धोखा है हर साँस में एक नये जन्म का मौक़ा है हर बार ये सांस.. हवा बन जाती है हर बार ये नाज़ुक देह छूट जाती है सब जोड़ते हैं साँसों की कड़ियों को तो जीवन की डोर जुड़ जाती है &nbsp; किसी अपने को एक एक सांस के लिए तरसते देखकर... सारे कीर्तिमान... लड़ाई-झगड़े... व्यर्थ नज़र आते हैं... इस वक्त मृत्यु का बोध.. ये बता रहा है.. कि आसपास हर ज़िंदा कृति को.. अपनेपन की ऑक्सीजन की ज़रूरत है.. उन्हें ये ऑक्सीजन देते चलिए... <video controls width="100%" controlsList="nodownload" src="https://media.sidtree.net/video/2021-Oxygen-Poem.mp4"></video> > Use 🎧 for better experience ##### Context Note Written in April 2021, when an entire country was counting breaths. The poem first travelled as a 99-second audio-video piece, because the body needed to hear it more than read it. Belonging is a kind of oxygen. It costs nothing to give. 2021-04-18