## Paper Flowers : वक़्त की माँग हैं काग़ज़ के फूल #Poetry ![[Pub-Paper-Flowers.webp]] अकड़ी हुई बुनियादों पर खड़े कॉन्क्रीट के दफ़्तर में एक मेज़ रखी है जिस पर तरह तरह के फूल हैं और ये फूल मुरझा भी जाएँ तो हटाने का मन नहीं करता क़ुदरत से जुड़ी असली चीज़ों की बहुत कमी है यहाँ आस पास देखिए पेड़ कट कर मेज़ बन गया है फूल कटकर गुलदस्ता बन गए हैं और तमाम इंसान कटकर मुलाजिम बन गए हैं सूरज न तो उगता है, और न ही डूबता है यहाँ ट्यूबलाइट की रोशनी में झुलसते गुलाबी, पीले फूल अक्सर दिख जाते है फिर लगता है हर जगह की मिट्टी मुलायम तो नहीं हो सकती हर जगह फूल जड़ों के साथ ज़िंदा तो नहीं रह सकते इसलिए यहाँ असली नहीं काग़ज़ के फूलों की ज़रूरत है जिनको मुरझा जाने का ख़तरा न हो जिनकी कोई महक न हो और जिन्हें सूरज, हवा, खाद, पानी की ज़रूरत न हो   --- ##### Context Note A 2015 poem on corporate spaces where everything natural has been cut into something functional - trees into desks, flowers into bouquets, people into employees. The poem quietly asks whether paper flowers are the problem, or just an honest mirror of the ecosystem that demands them. 2015-02-13