## चांद के टुकड़े | Pieces of Moon #Poetry दिन डूब रहा था वो आँख मलते हुए उग रहा था शहर की फितरत ही कुछ ऐसी थी वहां सभी के मुखड़े चांद के टुकड़े थे पराई पूँजी के आलोक से चमकते इन चाँद से मुखड़ों की .. ऊबड़ खाबड़ सतह .. एक मालामाल उपभोक्ता की तरह रोशनी में नहाई रहती बहुत दूर से रोशनी को सबकी तरफ ठेलते पसीने से लथपथ सितारे यही सोचते रहते कि उनकी सारी रोशनी आखिर टैक्स में क्यों कट जाती है ? हर उपभोक्ता की मंद मंद मुस्कान में निर्माता के पैरों की बेवाइयां दिखती हैं ![[Pub-pieces-of-moon.webp|400]] *© Photograph by Legendary Photo Artist Raghu Rai* ##### Context Note A city of borrowed light. Faces glow like fragments of the moon, while elsewhere, the stars that labored for that brightness remain unseen. The poem traces the distance between radiance and its source. 2020 %% काव्य के नये सूत्र, नये आयाम रचने की कोशिश है, डिजिटल दौर में कुछ महसूस कर पाना ही सबसे बड़ी पूँजी है, वही बाँट रहा हूँ, आप शेयर करेंगे.. तो बात दूर तक पहुँचेगी हर उपभोक्ता की मंद मंद मुस्कान में .. निर्माता के पैरों की बेवाइयां दिखती हैं .. आज पराई पूँजी के आलोक से चमकने वाले चांद के टुकड़ों को देखिए.. आपके आसपास कई होंगे… %%