## पीयूष का मज़बूत जोड़
Piyush Ad-hesive !
#Faces
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आज उस लेखक और क्रियेटिव डायरेक्टर की बात करना चाहता हूं... जिसने इश्तेहारों को एहसास बना दिया। नाम है पीयूष पांडे...और इनका काम हमेशा भारत की सुनहरी यादों में ज़िंदा रहेगा..।
> वो सिर्फ विज्ञापन नहीं लिखते थे, वो रिश्ते गढ़ते थे।
> वो स्लोगन नहीं बनाते थे, वो भरोसा पैदा करने वाले शब्द गढ़ते थे।
आज, जब 70 साल की उम्र में पीयूष पांडे दुनिया को अलविदा कह गए.. तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने बचपन से... घर की दीवारों से.. पिछले चार दशक की यादों से.. कुछ निकाल लिया हो।
***फेविकॉल का मजबूत जोड़ है, टूटेगा नहीं...*** अब ये लाइन सिर्फ एक ब्रांड की पहचान नहीं, बल्कि खुद पीयूष पांडे की विरासत बन गई है। ***हर घर कुछ कहता है... कि उसमें कौन रहता है...***. ये लाइन लिखकर उन्होंने ये बताया कि घरों की भी आवाज़ होती है।
***मिले सुर मेरा तुम्हारा*** से उन्होंने पूरे भारत को एक सुर में पिरो दिया।
***दो बूंद ज़िंदगी की*** लिखकर पोलियो अभियान को जन जन के दिमाग में फिक्स कर दिया...
हच का प्यारा सा कुत्ता जो पीछे पीछे दौड़ता था उसके साथ ये संदेश चिपका दिया कि ***wherever you go, our network follows.***
और ***अबकी बार, मोदी सरकार*** जैसा नारा लिखकर उन्होंने दिखा दिया कि शब्द में सत्ता का रास्ता बनाने वाली शक्ति होती है।
>उनसे कभी मिला नहीं... लेकिन ऐसा लगता है कि हमेशा से जानता हूं। बहुत अपने से लगते हैं... एक दौर में मन किया था कि एड की दुनिय़ा में जाकर कुछ ऐसा नया और अलग करूं... जैसा उन्होंने अपने दौर में किया...
जयपुर में जन्मे, दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से पढ़े, और फिर क्रिकेट के मैदान से लेकर एड वर्ल्ड तक का सफर तय करने वाले पीयूष पांडे ने विज्ञापन को अंग्रेज़ी की चमक से निकालकर देसी मिट्टी की खुशबू दी। उन्होंने ब्रांड्स को इंसान जैसा जीवंत बनाया... और इंसानों को अपने शब्दों में घुले अपनेपन से जोड़ दिया।
ओगिल्वी के गलियारों से लेकर हर भारतीय के लिविंग रूम तक, उनके शब्द गूंजते रहे।
==वो ऐसे वक्त में आए जब विज्ञापन दिखते थे... और उनकी भाषा अंग्रेज़ी के इर्द गिर्द घूमती थी.. लेकिन उन्होंने विज्ञापनों को महसूस करने लायक बना दिया.. और उनसे हिंदी में सोचने समझने वाले हिंदुस्तानियों के दिल पर दस्तक की==
पद्मश्री पीयूष पांडे ने अपने काम से साबित किया कि क्रिएटिविटी सिर्फ कल्पना नहीं होती.. वो संस्कृति होती है। उनके जाने से एक युग का अंत हुआ है, पर उनके शब्द अब भी हर जिंगल, हर दीवार, हर टी.वी. ब्रेक में ज़िंदा हैं। ***कुछ जोड़ सच में इतने मजबूत होते हैं... कि टूटते नहीं।***
2025-10-24