## विष-अमृत : Poison Defeated! #Poetry संसार में विष घोलने वालों को मेरी तरफ से ढेर सारा अमृत। बचपन में हम विष अमृत बहुत खेलते थे। तब विष को अमृत बनाने के खेल में सिर्फ दूसरे को छू देना ही काफी होता था। विष को छूकर अमृत कर देने वाला ये जादू मुस्कान बनकर भारत की एक पूरी पीढ़ी के चेहरे पर चिपका हुआ है। आइये ये खेल फिर से खेलते हैं... उम्र इतनी नहीं हुई है कि खेल ना सकें। विष को खत्म करने के लिए अमृत की एक छुअन ही काफी है। और ये काम कविताओं से भी हो सकता है। ![[Pub-Poison-Defeated.webp]]   ### वो अपनी साड़ी से दु:शासन को ढकती है पहाड़ जैसे दुख दर्द... जब किसी को दिखते नहीं है.... तब निराशा विज्ञापन बनकर छपती है मन में बैठे साँप जैसे डर जब रोज़ आसपास वालों को डँसते हैं तब हताशा, मुस्कान पहनकर सजती है और विनम्रता... राजपुरुषों की दासी है बार बार दाँव पर लगती है और अपनी उतरती हुई साड़ी से दु:शासन को ढकती है   ### कटी हुई जीभ साँप को प्रचार की तलब है... और उसकी कटी हुई जीभ ही उसका विज्ञापन है बड़ा क़िस्मत वाला है... भगवान का दिया सब कुछ है उसके पास   ### उत्साह की एसिडिटी क़ाबिलियत और उत्साह कई बार मुँह में खट्टे पानी की तरह आ जाते है गला जलने लगता है अंदर ही अंदर एसिड का उबाल मन की दीवारों को छू लेता है और फिर जुगाड़ जीत जाता है   ### नाज़ुक लोगों का नाच संसार के सारे नाज़ुक लोगों की भीड़ आज नाच रही है क्योंकि इस भीड़ ने मज़बूत लोगों को मज़दूर बना दिया है   ##### Context Note A childhood game returns as a poetic act of defiance. In Vish-Amrit, one touch could turn poison into nectar - these five small poems attempt the same, pressing verse against the venom that hides in smiles, in politeness, in the machinery of the world. 2019-08-25