## Profile Picture : तस्वीर पर माला डाल देते हैं दोस्त
#Poetry
सोशल मीडिया के इस दौर में मानव स्वभाव को रेखांकित करते हुए, मैंने कुछ कविताएँ लिखी हैं। ये एक सीरीज़ है जिसका शीर्षक है [[Anti Social Poems]]
इस सीरीज़ की पहली कविता है प्रोफ़ाइल पिक्चर..
इसके दो हिस्से है, एक ध्वनि है और दूसरी प्रतिध्वनि
ध्वनि \(Sound\)
वाह-वा और दाद देने वाले असली हाथ
अब नहीं पहुंच पाते कंधे तक
बस निर्जीव ‘प्रोफाइल पिक्चर’ पर
हर रोज़ माला चढ़ा देते हैं दोस्त
यार बहुत हैं
प्यार बहुत है
बहुत चाहते हैं मुझे
इसलिए अब मुझे दीवार पर फ़ोटो बनकर टंगे रहना अच्छा लगता है
मान-सम्मान-अपनापन और वजूद
घर बैठे मिल रहा हो
तो मुलाक़ातें बोझ लगती है
प्रतिध्वनि (Echo)
देखो, गले में कितने हार हैं !!
जैसे कोई नेता है और चमचे चार हैं
अलग अलग कोण से ली जा रही तस्वीर में
लोकप्रिय होने की चाहत है
लेकिन… कुछ ही घंटों के बाद…
तारीफों की ये मालाएं सूख जाती हैं
और कैमरा फिर ढूंढने लगता है
अपने ही जीवन का कोई ऐसा कोना
जो दिखाया जा सके
ये दिखाना..
उस पीढ़ी की दिनचर्या है..
जिसने अपने अंदर कभी देखा ही नहीं
##### Context Note
Real hands that once cheered and praised no longer reach the shoulder; friends just put a garland on the lifeless profile picture every day. When respect, belonging and a sense of existence arrive while sitting at home, meeting in person feels like a burden. But the garlands of praise dry up in a few hours, and the camera goes looking for the next corner to show. This is the first poem in the anti-social series, in two parts, a sound and its echo.
2017-11-19