## Right to Equality : बराबरी का अधिकार #Poetry कविवार में अबकी बार, बराबरी का अधिकार। एक बात बताइये..क्या स्त्री और पुरुष..गुणों की किसी भी एक कसौटी पर बराबर हो सकते हैं? इसका जवाब है नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता.. क्योंकि स्त्री और पुरुष के कुछ स्वाभाविक गुण हैं और वही गुण उन्हें अलग या विशिष्ट बनाते हैं। बराबरी का मतलब ये नहीं है कि स्त्री और पुरुष अपने स्वाभाविक गुणों को खो दें और सब एक जैसे हो जाएं.. सबकी एक जैसी शक्ति, एक जैसा स्वभाव। ये संसार के साथ सबसे बड़ी क्रूरता होगी। दिक्कत ये है कि स्त्री के स्वाभाविक गुणों को कमज़ोर मान लिया गया है। नाज़ुक होना, संवेदनशील होना भी एक शक्ति है, लेकिन इसे कमज़ोर मान लिया गया । आपने विलोम शब्दों के बारे में पढ़ा होगा। अंग्रेज़ी के लेंस से देखें तो Female वो है जो Male का विपरीत हो. यानी स्त्री का अस्तित्व ही एक विलोम शब्द के रूप में रच दिया गया। हालांकि मूल रूप से ऐसा नहीं था। Female को फ्रेंच भाषा के शब्द Femelle से उठाया गया और ध्वनि के आधार पर उसके अंत में Male जोड़ दिया गया। डिक्शनरी \(शब्दकोश\) या थिसॉरस \(समांतर कोश\) में खोजेंगे तो Female को अर्थ देने वाले कई मुलायम शब्द आपको मिलेंगे। सौंदर्यबोध, नज़ाकत, लालित्यमय, चारु भाव… आप देखते चले जाएंगे.. लेकिन स्त्री सौंदर्य को शब्दों में व्यक्त करने की उपमाएं ख़त्म नहीं होंगी। यानी सामान्य सी डिक्शनरी में भी स्त्री के मूल स्वभाव की ताकत देखी और समझी जा सकती है। लेकिन अब स्त्रियों की एक पूरी भीड़, अपनी तराशी हुई काया और त्वचा के भीतर.. पुरुष हो जाना चाहती है। Female शब्द से F और E को काटकर फेंक देने की ये भूख, बराबरी के अधिकार का मुखौटा लगाकर आई है। और सबसे बड़ा मज़ाक ये है कि स्त्रियां अपने सांस्कृतिक कद से गिरकर, उसे छोटा करके पुरुषों के बराबर होना चाहती हैं। भारतीय संस्कृति में स्त्री के गुणों को देवतुल्य माना गया है। जितने भी देवता हुए हैं उनमें स्त्री गुण अधिक थे जबकि राक्षसों में स्त्रियों के गुण कम होते थे। इसी देश में अर्धनारीश्वर की कल्पना की गई। और ये भी सच है कि इसी देश में बलात्कार हो रहे हैं, मनुहार/छेड़छाड़ के बजाए बदतमीज़ी/अश्लील हरकतें हो रही हैं। इस संदर्भ में स्त्रियों का विद्रोह उचित भी लगता है, लेकिन थोड़ी देर विचार करने के बाद आप पाएंगे कि स्त्री और पुरुष अपनी अपनी जगह पर विशिष्ट तो हो सकते हैं, लेकिन बराबर नहीं हो सकते। Comics और सुपरहीरो सिनेमा की नज़र से देखें तो ये Hard Superpowers और Soft Superpowers का द्वंद्व युद्ध है। और इसमें वही जीतेगा जो कुंठित नहीं होगा। Wonder Woman और Super Man, चाहें तो एक ही दौर में, एक ही फिल्म में काम कर सकते हैं। इस पूरे भाव पर जब मैं कविता लिख रहा था तो मुझे लगा कि इस कविता को थोड़ा क्रूर होना चाहिए, थोड़ा खुरदरा होना चाहिए। ये ऐसी बात है जो सबको चुभनी चाहिए।   स्त्री और पुरुष के बीच बराबरी का एक ही रास्ता है स्त्री में मौजूद स्त्री-तत्व को मरना होगा जीवन का सारा नाज़ुक सौंदर्य खुद पर तेल छिड़ककर आग लगा लेगा और सती हो जाएगा बराबरी के सिद्धांत कुंठाओं की कलम से लिखे गये थे उस कलम में एक ही रंग था पता नहीं क्यों विजय का रंग खून जैसा लाल ही होता है इसलिए.. अब हम सब एक जैसे होंगे सबकी एक जैसी तासीर एक जैसा रंग एक जैसा स्वभाव तुला के एक पलड़े पर स्त्री ने अपने वक्षस्थलों को काटकर रख दिया है बराबरी के अधिकार के लिए ये कुर्बानी याद रखी जाएगी   ##### Context Note This is a deliberately harsh, provocative poem. It argues that men and women are each distinct, and worries that in chasing sameness, the gentle, sensitive strength of the feminine is treated as weakness and sacrificed. The verse is written to sting, framing equality as a sacrifice laid on one pan of the scale. It is one view, meant to provoke thought rather than settle the question. 2018-10-14