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# SPARKS | 2025
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**Sparks — ख़्यालों का रजिस्टर।**
दिन भर जो अचानक दिलोदिमाग में कौंधता है,
वह मेरे फ़ोन, आईपैड या कंप्यूटर से यहाँ पहुँच जाता है।
पहली बार जो विचार कौंधता है, उसके कच्चेपन में एक ख़ास तरह की खुशबू होती है।
बाद में उस पर अनुशासन चुपड़ दिया जाता है, तौर-तरीक़े लगाए जाते हैं, व्याकरण बैठाया जाता है।
यहाँ कोशिश है कि साधना से साधे हुए के पीछे मौजूद थोड़ा-सा कच्चा भी दर्ज रहे।
इसे ओपन डायरी कह सकते हैं, मन में दस्तक देने वाली घटनाओं से उपजे ख़्यालों का रजिस्टर भी।
हर Spark अंतिम नहीं है। कई शायद किसी बड़े लेख, किसी शो, किसी विचार-व्यवस्था का बीज हों।
यह polished कथन नहीं, सोच का प्रथम संस्करण है। #Sparks
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#### 2025-01-01 · 10:21 AM
2025 में आप सब स्वस्थ रहें।
सुख-दुख के मध्य, मुस्कान के अभ्यस्त रहें।
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#### 2025-01-01 · 3:25 PM
धूप जो चेहरों पर लिखती है,
वो मुझे भी लिखना है।
कितने ही काँच हों, या कॉन्क्रीट हो बीच में,
धूप हमारे मन में क्रेडिट हो जाती है।
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#### 2025-01-03 · 12:41 AM
अपनों ने ही शून्य से गुणा किया हमें…
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#### 2025-01-11 · 12:40 PM
विवशता के विष से जलकर अकड़ जाना,
और फिर छिन्न-भिन्न होकर बिखर जाना…
प्रतिज्ञाओं ने निरर्थक होकर मुक्ति पाई है।
हर युद्ध की रक्तयुक्त राख में
प्रतिज्ञाओं के खनिज हैं।
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#### 2025-01-12 · 8:01 PM
फिल्म अद्भुत है। अरसा पहले देखी थी।
नाम है *Internet’s Own Boy: The Story of Aaron Swartz*।
जिन संवेदनाओं और मसलों की बात इसमें है,
उससे तमाम देश और समाज कई प्रकाशवर्ष की दूरी पर हैं।
अन्यायपूर्ण कानूनों की समीक्षा इस कहानी का केंद्रबिंदु है —
ऐसे कानून, जो 26 वर्षीय जीनियस की साँसें रोक देते हैं।
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#### 2025-01-14 · 11:00 AM
हम सबके अपने-अपने आसमान हैं,
लेकिन सूर्य एक ही है।
सूर्य का उत्तरायण होना नई ऊर्जा का प्रतीक है।
अब सूर्य की किरणों के साथ सुख तेज़ी से डाउनलोड होंगे।
भारतीय परंपराओं में यह मान्यता है कि चार वेदों के बाद
पाँचवें वेद के रूप में आयुर्वेद की रचना हुई —
और उसे सूर्यदेव के हाथों में सौंप दिया गया।
तात्पर्य यह है कि स्वस्थ जीवन का सूत्र भी
सूर्य की किरणों में बसता है।
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#### 2025-01-25 · 11:47 AM
क्या बेईमानी हमारे देश का राष्ट्रीय उसूल बन चुका है?
व्यवस्था के शानदार होने का विज्ञापन छपवा देने से
क्या व्यवस्था शानदार हो जाती है?
क्या विज्ञापन ही हमारे युग के नीति-निर्माता हैं?
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#### 2025-02-01 · 9:24 PM
कई बार हम अपनी थकान को भी
कटाक्ष बनाकर हँस लेते हैं।
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#### 2025-02-04 · 5:06 PM
दरवाज़े पर उजाला।
कुछ तस्वीरों में हवा की गुणवत्ता का पता नहीं चलता।
मुस्कान यह बात छिपा लेती है कि
माहौल पर काबिज़ कार्बन के कण
कैसे ऑक्सीजन का गला दबा रहे थे।
टैक्स काटकर जो उजाला हिस्से में आता है,
वही प्रक्षेपित करना, करते रहना सांसारिक दायित्व है।
क्योंकि मुसीबतों के कण कम होंगे नहीं,
अलग-अलग प्रकार के गोंद से चिपकी बहुत-सी आँखें खुलेंगी नहीं,
अकड़ी हुई असंख्य गर्दनें जायज़ बात की ओर मुड़ेंगी नहीं।
विषमताओं का संकलन ही जीवन का सूचकांक नहीं है।
उजाला रोज़ उस दरवाज़े पर आता है,
जिसे खोलना आपका फ़ैसला है।
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#### 2025-02-23 · 1:34 PM
जो चाहिए, वो पूरा न हो तो
मांसपेशियाँ विद्रोह के नारे लगाती हैं।
अकड़कर हड़ताल पर चली जाती हैं।
इच्छा की जकड़ साकार होती है,
दिखती है,
रिसती है।
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#### 2025-03-14 · 4:51 PM
आज सड़कों पर लोग नहीं दिखे।
हमने चेहरों पर खूब रंग लिखे।
त्वचा की सीमा-रेखा कैसे रोकेगी इन्हें —
रंग जो उमड़-घुमड़कर उठे।