![[Sparks.webp]] # SPARKS | 2026 [[Sparks 2024|2024]] → [[Sparks 2025|2025]] → 2026 **Sparks — ख़्यालों का रजिस्टर।** दिन भर जो अचानक दिलोदिमाग में कौंधता है, वह मेरे फ़ोन, आईपैड या कंप्यूटर से यहाँ पहुँच जाता है। पहली बार जो विचार कौंधता है, उसके कच्चेपन में एक ख़ास तरह की खुशबू होती है। बाद में उस पर अनुशासन चुपड़ दिया जाता है, तौर-तरीक़े लगाए जाते हैं, व्याकरण बैठाया जाता है। यहाँ कोशिश है कि साधना से साधे हुए के पीछे मौजूद थोड़ा-सा कच्चा भी दर्ज रहे। इसे ओपन डायरी कह सकते हैं, मन में दस्तक देने वाली घटनाओं से उपजे ख़्यालों का रजिस्टर भी। हर Spark अंतिम नहीं है। कई शायद किसी बड़े लेख, किसी शो, किसी विचार-व्यवस्था का बीज हों। यह polished कथन नहीं, सोच का प्रथम संस्करण है। #Sparks --- #### 2026-02-15 · 11:53 PM कई बार जब व्यवस्था किसी वंचित को कुछ दे नहीं सकती और उसे डर होता है कि वंचित अपराधी न बन जाए तो वो ऐसे लोगों को थोड़ा बदतमीज़ होने का लाइसेंस दे देती है इस तरह बदतमीज़ शहरी का और बदमिज़ाज शहरों का निर्माण होता है --- #### 2026-02-15 · 11:58 PM बिना सहन किए न ख़ानदान बनते हैं न बिज़नेस बहुत कुछ सोखना पड़ता है शुद्ध में मिलावट करनी पड़ती है साफ़-सुथरा सदाचारी बिज़नेस/खानदान — एक खोज है --- #### 2026-02-16 · 2:30 AM AI इस तरह लिखता है जैसे वो सब कुछ जानता है, लेकिन जानना ही अनुभव नहीं है। --- #### 2026-02-18 · 9:37 PM प्रचार ही सर्वगुण सम्पन्न नीति है हर सत्ता की इसी से प्रीति है --- #### 2026-02-18 · 10:35 PM इन दिनों शहर में हम अपनों के साथ रहते हुए भी उन्हें याद करते हैं और उन्हें मिस करते हैं यह जो पास रहते हुए दूर दूर लगना है, वैसा ही है जैसे चुंबक के समान ध्रुव जो काफी पास आ जाते हैं फिर रुक जाते हैं और जुड़ते है विपरीत होने पर यानी दूर जाने पर --- #### 2026-02-18 · 9:37 PM प्रचार ही सर्वगुण सम्पन्न नीति है हर सत्ता की इसी से प्रीति है --- #### 2026-02-18 · 10:35 PM इन दिनों शहर में हम अपनों के साथ रहते हुए भी उन्हें याद करते हैं और उन्हें मिस करते हैं यह जो पास रहते हुए दूर दूर लगना है, वैसा ही है जैसे चुंबक के समान ध्रुव जो काफी पास आ जाते हैं फिर रुक जाते हैं और जुड़ते है विपरीत होने पर यानी दूर जाने पर --- #### 2026-02-23 · 1:42 AM हिम्मत की कोंपलें फूटने में वक्त लगता है कई मौसम गुज़रते हैं रास्ता सख़्त लगता है खर्च ज़्यादा नही कई बार बस एक शब्द लगता है --- #### 2026-02-24 · 7:37 PM तारीफ़.. बस एक घुमाव या रोटेशन पर धुंधली हो जाती है इसके चक्कर में अपनी नज़र धुंधली नहीं करनी चाहिए --- #### 2026-03-08 · 10:06 AM मेरी समझ में कविता का एक गुण ये भी है कि वो शब्दों के बीच किस तरह का सन्नाटा रचती है किस तरह की चुप्पियाँ पैदा करती है यानी शब्द ऐसे हों जिन के बीच सोचने को मजबूर करने वाली खाली, निःशब्द जगह हो। --- #### 2026-03-31 · 10:18 PM मन की खदान से सोना निकालना होगा सोना ख़रीदने की नहीं, सोना बनने की ज़रूरत है, इंसान का गोल्ड स्टैंडर्ड --- #### 2026-05-09 · 1:04 PM क्या हरी स्याही से हरियाली लिखी जा सकती है ? जो बंजर है क्या वो लिख लिखकर हरा हो जाएगा ? बीज और स्याही... इनका क्या रिश्ता है ? सादा पन्ना...या ख़ाली ज़मीन का टुकड़ा ! शब्द हैं बीज... जो पढ़ने वाले की नज़र के नीर से... फलते फूलते हैं.. मन में हरियाली आती है तो संसार हरा दिखता है।