## रविवार: वह दिन जब हम अपने आप से बचते हैं ![[Pub-sunday.webp|400]] यह लेख उस बेचैनी से निकला है जो छुट्टी के दिनों में काम रुकते ही अचानक सामने आ खड़ी होती है इसकी जड़ें एक सदी पुराने एक साहित्यिक अवलोकन में हैं, लेकिन सवाल पूरी तरह हमारे वर्तमान के हैं। #Doorbeen --- **भारत में रविवार अब आराम का दिन नहीं होता।** यह वो दिन होता है जब काम रुकता है और मन के पास पहली बार ख़ुद को सुनने का समय आ जाता है। यहीं से बेचैनी शुरू होती है। छुट्टी या वीकली ऑफ़ वाले दिन काम रुकते ही बहुत से लोग असहज हो जाते हैं **यह थकान नहीं है** **डर है** डर इस बात का कि अगर काम न हो, तो हमारे पास अपने बारे में कहने को क्या बचेगा? इसीलिए छुट्टी अक्सर राहत नहीं देती। बल्कि सवाल बनकर सामने खड़ी हो जाती है। **काम हमें एक ढांचा देता है** **ढांचा पहचान देता है** **और पहचान सुरक्षा देती है** समस्या उस दिन शुरू होती है जब यह ढांचा अपनी जगह से हट जाता है और हम अपने आप से ही टकरा जाते हैं।   **भारत में पहचान** **सदा ही काम से चिपकी रही है।** >**आप क्या करते हैं?** >अक्सर यही सवाल >आपका पहला परिचय होता है। यह बेचैनी नई नहीं है। औद्योगिक शहरों में इसे एक सदी पहले भी महसूस किया गया था। एक सदी पहले मैक्सिम गोर्की ने इसी बेचैनी को पहचान लिया था। उन्होंने अपने एक निबंध में लिखा था— > **“लोगों को काम करना सिखाया गया है,** > **जीना नहीं।”** आज यह पंक्ति किसी किताब की लाइन नहीं लगती, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की स्थितियों का बयान लगती है।   आज भारत में रविवार को लोग घर से निकलते हैं। मॉल जाते हैं कैफ़े में बैठते हैं पार्क में घूमते हैं घंटों स्क्रीन स्क्रॉल करते हैं ताकि सब चलता हुआ दिखता रहे लेकिन भीतर कुछ अटका रहता है एक ऐसा ख़ालीपन जिसके लिए हमारे पास शब्द नहीं होते। कभी इस अटके हुए को निकालने के लिए लोग यूँ ही सड़कों पर भटकते रहते थे अब बाहर जाने के बजाय फीड्स पर ही भटकते-भटकते दिन गुज़ार देते हैं > **कल की** > **अनंत सड़कें** > **आज की** > **अनंत फीड्स बन चुकी हैं** और यहीं अकेलापन एक सामूहिक शक्ल लेने लगता है।   **इस तरह देखा जाए तो** **भीड़ कोई दुर्घटना नहीं है** **बल्कि एक लक्षण है** उस समाज का लक्षण, जिसने मनुष्य को काम करना तो सिखाया, लेकिन काम के बिना खुद के साथ रहना नहीं सिखाया। अगर जीवन का अर्थ सिर्फ़ उत्पादकता है, तो हर छुट्टी एक समस्या बन जाएगी। **शायद इसलिए** **रविवार सबसे ज़्यादा शोर करता है** **क्योंकि उसी दिन** **हम ख़ुद से नहीं बच पाते..** और जब ख़ुद से नहीं बच पाते, तो भीड़ में घुल जाने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। समस्या यह नहीं है कि लोग भीड़ बन जाते हैं। समस्या यह है कि भीड़ बनते ही बेचैनी कम हो जाती है। --- इससे पहले रविवार को विराम — या नियंत्रित आलस्य की अंगड़ाई की तरह दूरबीन में देखा गया था— [[Sunday Pause]] --- संदर्भ / Further Reading मैक्सिम गोर्की — The City of the Yellow Devil (1906) हिंदी अनुवाद: पीले दैत्य का नगर, अशोक पांडे