## आज सच थोड़ा ज़्यादा हो गया : Truth Hurts #Poetry ![[Pub-Truth-Hurts.webp]] एकलव्य ने तो अँगूठा दिया था, यहाँ क़ौम दोनों हाथ कटाए बैठी है बिना हाथ वाले धड़ की गर्दन झुकते झुकते ज़माने के पैरों तक कब पहुँच जाती है पता ही नहीं चलता गर्दन पैरों पर, नाक जूतों पर और नाक पर तो बारूद भी नहीं होता कि रगड़ने पर जल जाए कुछ जूतों की चमक के लिए भीड़ नाक रगड़ रही है सवाल है कि आग कब लगेगी ? ये सोचते सोचते हिंदुस्तान गलकर आधा हो गया आज सच थोड़ा ज़्यादा हो गया   ##### Context Note In Mahabharata, Eklavya gave one thumb to Drona. This poem watches an entire country offer up much more, until even the nose ends up under someone's shoe. 2015-01-30