## चुप्पी के चित्रकार: विनोद कुमार शुक्ल
#Faces
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विनोद कुमार शुक्ल के जाने की खबर किसी साहित्यिक घटना जैसी नहीं लगी
यह ज़्यादा उस तरह की थी जैसे कोई आदमी अपना काम निपटाकर
चुपचाप बाहर निकल जाए... और थोड़ी देर बाद हमें महसूस हो कि कमरे की हवा बदल गई है
वे 88 साल के थे लेकिन उनकी उम्र कभी उनके लेखन में नहीं आई...
उनके यहाँ समय घड़ी से नहीं, संवेदना से चलता था...
विनोद कुमार शुक्ल उन लेखकों में नहीं थे जो साहित्य को केंद्र में रखकर
जीवन को उसके चारों ओर सजाते हैं।
उन्होंने जीवन को जिया, और साहित्य उसी जीवन से अपने आप निकल आया।
आप ये कह सकते हैं कि उनकी ज़िंदगी भी कविता जैसी थी
रायपुर में रहते हुए, सरकारी नौकरी करते हुए, सीमित साधनों और एक लगभग गुमनाम रोज़मर्रा में, उन्होंने हिंदी भाषा की एक असाधारण शैली रची जिसमें गज़ब का ठहराव था
बिना साहित्यिक राजधानी के पास गए, बिना मंचों पर लगातार दिखे, बिना यह साबित किए कि वे महत्वपूर्ण हैं... उनकी महत्ता उनकी अनुपस्थिति में थी। उनकी कविता और गद्य में किरदार अक्सर कुछ नहीं करते... बस होते हैं.. और उनके बस होने में ही पूरा जीवन धड़कता रहता है।
विनोद कुमार शुक्ल की भाषा यह नहीं बताती कि क्या सोचना है।
वह हमें थोड़ा धीमा कर देती है
और आज के समय में...
धीमा होना... सबसे बड़ा प्रतिरोध है... इसलिए कई बार पाठक गति को मैच नहीं कर पाते.. लेकिन कोई क्षण ऐसा आता है जब वो गति मिलती है और पंक्ति कौंधती है।
उनकी भाषा में कभी हड़बड़ी नहीं थी... वे शब्दों को दौड़ाते नहीं थे, उन्हें टहलने देते थे..
इतना धीरे कि वाक्य अपने आप से मुलाकात करने लगें
उनके लेखन में घटनाएँ नहीं, स्थितियाँ होती हैं... और वही स्थितियाँ पाठक के भीतर काफी देर तक ठहरी रहती हैं...
> जिस तरह उनकी कविता में
> कोई आदमी
> नया गरम कोट पहनकर
> विचार की तरह चला जाता है
> और कवि
> रबर की चप्पल में
> थोड़ा पीछे रह जाता है
ठीक उसी तरह विनोद कुमार शुक्ल
साहित्य की दौड़ में कभी बहुत आगे नहीं दिखे। वे हमेशा थोड़ा पीछे रहे। और उसी पीछे रहने में
उन्होंने सब कुछ देख लिया। उन्हें बड़े सम्मान मिले, साहित्य अकादमी पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला लेकिन इन सम्मानों ने
उनके जीवन, व्यक्तित्व या भाषा में कोई बदलाव नहीं किया...
आज की भाषा हर चीज़ का मतलब चाहती है
विनोद कुमार शुक्ल की भाषा मतलब से पहले मौजूदगी चाहती है
> उनकी कविता में घोड़े के लिए कोहरा घास बन जाता है,
> कोहरे में दूर दिखते धुंधले धब्बे के अंदर वो मनुष्य को ढूंढ़ लेते हैं
> यह कल्पना नहीं है... यह करुणा है
विनोद कुमार शुक्ल
अब कुछ नया नहीं लिखेंगे।
लेकिन जो चुप्पी वे अपनी रचनाओं में
छोड़कर गए हैं... उसमें हम अब भी उन्हें पढ़ सकते हैं।
उनका जाना
किसी पूर्णविराम जैसा नहीं लगता..
यह एक अल्पविराम है.. जो रुकता है और अपनी एक आंख से
पीछे मुड़कर.. देखता है...
उन्होंने 1965 में लिखा था कि
> आकाश की तरफ़
> अपनी चाबियों का गुच्छा उछाला
> तो देखा आकाश खुल गया है..
> ज़रूर आकाश में मेरी कोई चाबी लगती है!
मुझे ऐसा लगता है कि आज वो चाबी लग गई है..
उन पर लिखते हुए भी बहुत ज़्यादा लिख जाना ठीक नहीं..
क्योंकि उनकी दुनिया में शब्दों से ज़्यादा ठहराव ज़रूरी था...
शायद यही बेहतर है कि यहाँ थोड़ा रुककर चुप रहा जाए...
और देखा जाए कि इस चुप्पी में अब भी क्या क्या गूंज रहा है।
2025-12-23